"कल 26 सितंबर शनिवार से, पितरों का द्वार खुलेगा शुभ कार्यों पर लगेगा ब्रेक" -
पितरों के प्रति श्रद्धा, तर्पण और श्राद्ध के लिए समर्पित पितृपक्ष इस वर्ष कल 26 सितंबर से शुरू होगा। पंचांग गणना के अनुसार पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर पूर्णिमा श्राद्ध से होगी और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा। इस बार पूर्णिमा से अमावस्या तक सामान्य तौर पर 16 दिनों की अवधि मानी जाने वाली श्राद्ध अवधि में तिथियों के संयोग के कारण 15 दिनों में ही सभी श्राद्ध कर्म संपन्न होंगे।
इस वर्ष का श्राद्ध पक्ष शनिवार से प्रारंभ होकर शनिवार को ही खत्म हो रहा है। श्राद्ध पक्ष वास्तव में पितरों को याद करके उनके प्रति श्रद्धा भाव प्रदर्शित करने और नई पीढ़ी को अपने प्राचीन वैदिक और पौराणिक संस्कृति से अवगत कराने का पुण्य पर्व है और यही नहीं पित्रों का श्राद्ध करने से जन्म कुंडली में व्याप्त पितृदोष से भी हमेशा के लिए छुटकारा मिलता है।
ज्योतिषाचार्य पं. प्रवेश रंजन शर्मा के अनुसार, इस बार पितृपक्ष की शुरुआत शनिवार, 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध से होगी। प्रतिपदा श्राद्ध 27 सितंबर को किया जाएगा। पितृपक्ष के दौरान पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान, दान और अन्य धार्मिक कर्म किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए इन कर्मों से पितरों की तृप्ति होती है और परिवार को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
सर्वार्थ सिद्धि योग में होगी शुरुआत -
पं. प्रवेश रंजन शर्मा के मुताबिक, पितृपक्ष का पहला दिन विशेष योगों से भी जुड़ा है। 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध के दौरान सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 6:12 बजे से 11:08 बजे तक रहेगा। इसके अलावा सुबह से 11:17 बजे तक वृद्धि योग रहेगा, जिसके बाद ध्रुव योग बनेगा। धार्मिक ज्योतिषीय मान्यताओं में वृद्धि योग को पुण्य फल में वृद्धि से जोड़कर देखा जाता है।
01 अक्टूबर को पंचमी व षष्ठी का श्राद्ध -
निर्णयसागर और ब्रजभूमि पंचांग के अनुसार पितृपक्ष में इस बार तिथियों के संयोग के कारण 01 अक्टूबर को पंचमी और षष्ठी दोनों तिथियों का श्राद्ध एक ही दिन होगा। जिन पूर्वजों का निधन पंचमी व षष्ठी तिथि को हुआ था, उनके लिए इसी दिन श्राद्ध कर्म किया जाएगा। पितृ कर्म के लिए मृत्यु तिथि का सही ज्ञान महत्वपूर्ण माना जाता है।
04 अक्टूबर को मातृ नवमी -
पितृपक्ष की नवमी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इस वर्ष 4 अक्टूबर को नवमी श्राद्ध के साथ मातृ नवमी होगी। इस दिन दिवंगत माताओं, दादियों, नानियों तथा अन्य महिला पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है।
10 अक्टूबर को गजच्छाया योग और सर्वपितृ अमावस्या -
पितृपक्ष का समापन 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। ज्योतिषाचार्य के अनुसार, इस दिन सूर्य और चंद्रमा के हस्त नक्षत्र में होने से गजच्छाया योग बनने की ज्योतिषीय गणना बताई गई है। धार्मिक मान्यता में इस योग को श्राद्ध, पितृ तर्पण और तीर्थ स्नान के लिए विशेष फलदायी माना जाता है। बताया गया है कि यह योग सूर्योदय से सूर्यास्त तक रहेगा।
सर्वपितृ अमावस्या उन पितरों के लिए विशेष मानी जाती है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है अथवा किसी कारण से निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं किया जा सका। ऐसे पितरों के निमित्त इस दिन श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है।
पितृपक्ष में इन कार्यों से बचने की परंपरा -
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष पूर्वजों के स्मरण और तर्पण का समय है। इसलिए इस दौरान सादगी और संयम का पालन किया जाता है। विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, उपनयन संस्कार, भूमि पूजन जैसे मांगलिक कार्यों को इस अवधि में नहीं करने की परंपरा है। नए कपड़े, आभूषण, वाहन और अन्य विलासिता की वस्तुओं की खरीदारी से भी बचने की मान्यता कई परिवारों में प्रचलित है।
श्राद्ध के दिन क्या न करें -
श्राद्ध कर्म के संबंध में धार्मिक परंपराओं में कुछ नियम बताए गए हैं। शाम और रात में श्राद्ध करना वर्जित माना जाता है। कुतपकाल में श्राद्ध और पितरों के निमित्त दान का विशेष महत्व बताया गया है। श्राद्ध वाले दिन पान का सेवन, तेल मालिश, स्त्री-संग और अन्न ग्रहण से संबंधित भी विभिन्न धार्मिक निषेध बताए गए हैं।
पितृ ऋण से मुक्ति का माना गया माध्यम -
मार्कण्डेय पुराण में पितरों को श्राद्ध से संतुष्ट होने पर आयु, संतान, धन, विद्या, सुख, राज्य और मोक्ष प्रदान करने वाला बताया गया है। हिंदू धार्मिक परंपरा में देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण का उल्लेख मिलता है। पितृपक्ष को पितृ ऋण के प्रति कर्तव्य निभाने का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। मान्यता है कि जिस तिथि को पूर्वज का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर पितृपक्ष में तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और दान करने से पूर्वजों का स्मरण एवं सम्मान होता है।
अज्ञात मृत्यु तिथि वालों के लिए सर्वपितृ अमावस्या महत्वपूर्ण -
ज्योतिषाचार्य पं. प्रवेश रंजन शर्मा के अनुसार, जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या किसी कारण से निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया, उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या का दिन महत्वपूर्ण माना जाता है। 10 अक्टूबर को ऐसे सभी पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और दान किया जा सकता है।
दक्षिण दिशा को क्यों माना जाता है पितरों की दिशा ?
ज्योतिषाचार्य पं हृदय रंजन शर्मा जी ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं में दक्षिण दिशा का संबंध यमराज और पितृलोक से जोड़ा गया है. इसी वजह से दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा कहा जाता है. श्राद्ध और तर्पण जैसे कर्मों के दौरान दक्षिण दिशा की ओर मुख करने की परंपरा इसी धार्मिक मान्यता से जुड़ी हुई है. हिंदू परंपरा में दिशाओं को केवल दिशा के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उनका संबंध अलग-अलग देवी-देवताओं और आध्यात्मिक शक्तियों से भी जोड़ा गया है. दक्षिण दिशा का संबंध यमराज से माना जाता है, जो मृत्यु के देवता और धर्म के संरक्षक माने जाते हैं. इसी कारण पितरों को समर्पित धार्मिक कर्मों में दक्षिण दिशा का महत्व बढ़ जाता है.
तर्पण करते समय दक्षिण दिशा का क्या महत्व है ?
तर्पण का अर्थ जल अर्पित करना है. पितृपक्ष में लोग जल में काले तिल, कुश आदि मिलाकर अपने पूर्वजों को तर्पण देते हैं. धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा के साथ किया गया तर्पण पितरों के प्रति सम्मान और स्मरण का प्रतीक है. तर्पण करते समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करने की परंपरा बताई गई है. माना जाता है कि दक्षिण दिशा पितृलोक से जुड़ी हुई है, इसलिए इस दिशा की ओर मुख करके पितरों का स्मरण और जल अर्पित किया जाता है..
ज्योतिषाचार्य पं. प्रवेश रंजन शर्मा जी
(जन्म कुंडली, अंक ज्योतिष एवं वास्तु विशेषज्ञ)
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