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"Pitru Paksha 2026 : सुबह-शाम पूजा तो फिर श्राद्ध दोपहर में ही क्यों ? जानें क्या कहते हैं शास्त्र"
पंचांग के अनुसार, आज 26 सितंबर 2026 भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध के साथ पितरों के पावन पखवाड़े का आरंभ हो चुका है. अगले 16 दिनों तक हर कोई अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति, उनकी तृप्ति और कुल की समृद्धि के लिए तर्पण व पिंडदान करेगा. आमतौर पर हर शुभ कार्य, यज्ञ, हवन या ईश्वर की आराधना के लिए सुबह का समय सबसे पवित्र माना जाता है. लेकिन जैसे ही पितृ पक्ष आता है, तर्पण और ब्राह्मण भोज का समय ठीक दोपहर को तय कर दिया जाता है.
आइए जानते हैं, आखिर इसके पीछे क्या मान्यताएं हैं और शास्त्रों में इसे लेकर क्या कहा गया है.
सुबह श्राद्ध क्यों नहीं किया जाता ?
सुबह का समय देवों का होता है, क्योंकि ब्रह्म मुहूर्त को देवताओं का समय माना गया है. सुबह सूर्योदय के समय सभी दैवीय शक्तियां जागृत हो जाती हैं. भगवान की भक्ति के लिए जरूरी है कि मन एकाग्र रहे ताकि प्रभु में पूरा ध्यान लगाया जा सके. जागने के बाद हमारा मन शांत और स्थिर रहता है, इसलिए सुबह के समय देव पूजन को महत्व दिया है न कि पितृ पूजन. इसलिए श्राद्ध कर्म के लिए सुबह का समय सामान्य तौर पर मुख्य समय नहीं माना जाता.
श्राद्ध के लिए दोपहर का समय क्यों माना गया है खास ?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध कर्म का संबंध पितरों को समर्पित विशेष कर्मों से है. इसलिए इसके लिए दिन का ऐसा समय चुना गया है, जिसे शास्त्रीय परंपरा में पितृ कर्मों के लिए सही माना गया है. इसी वजह से श्राद्ध को सामान्य पूजा की तरह सुबह या शाम करने के बजाय मुख्य रूप से मध्याह्न के आसपास किया जाता है. द्रिक पंचांग के अनुसार पितृपक्ष के पार्वण श्राद्ध में कुतुप मुहूर्त और रौहिण मुहूर्त के साथ इनके बाद का अपराह्न काल भी श्राद्ध कर्म के लिए शुभ माना जाता है. इसके बाद श्राद्ध से जुड़े अन्य कर्म पूरे किए जाते हैं और तर्पण की प्रक्रिया भी परंपरा के अनुसार की जाती है. यानी श्राद्ध के लिए दोपहर का समय चुनने के पीछे की असली वजह धार्मिक परंपरा और पंचांग में बताए गए पितृ कर्म के विशेष समय हैं.
कुतुप और रौहिण मुहूर्त क्या होते हैं ?
श्राद्ध की बात होने पर कुतुप और रौहिण मुहूर्त का नाम अक्सर सुनने को मिलता है. ये दिन के विशेष समय माने जाते हैं, जिनका इस्तेमाल पारंपरिक रूप से श्राद्ध कर्म के लिए किया जाता है. कुतुप मुहूर्त दोपहर के आसपास आता है. इसके बाद रौहिण मुहूर्त आता है और फिर अपराह्न काल रहता है. पितृपक्ष के श्राद्ध में इन समयों को विशेष महत्व दिया गया है.
श्राद्ध कर्म के लिए मुख्य काल और शुभ मुहूर्त -
शास्त्रों (जैसे निर्णय सिंधु और मत्स्य पुराण) के अनुसार श्राद्ध कर्म, पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोजन कराने के लिए दिन का विशेष समय तय किया गया है। यदि इन मुहूर्तों के दौरान 'गजछाया योग' बनता है, तो इसे अत्यंत दुर्लभ और अक्षय फलदायी संयोग माना जाता है।
कुतुप काल (8वाँ मुहूर्त)
कुतुप काल दिन का 8वाँ मुहूर्त होता है। पापों का शमन करने के कारण इसे 'कुतुप' नाम दिया गया है।
समय - आमतौर पर यह दोपहर 11:30 बजे से 12:30 बजे के मध्य रहता है।
रोहिणी काल (9वाँ मुहूर्त)
सामान्य ज्योतिष में रोहिणी मुहूर्त चंद्रमा के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करने पर बनता है, परंतु श्राद्ध पक्ष में इसका संदर्भ अलग होता है।
समय - श्राद्ध के लिए रोहिणी काल सूर्योदय से सूर्यास्त के कुल समय को 15 भागों में बाँटने पर 9वाँ मुहूर्त होता है। यह कुतुप काल के तुरंत बाद आता है।
अभिजीत मुहूर्त
विशेषता - अभिजीत मुहूर्त प्रतिदिन के सूर्योदय के अनुसार थोड़ा परिवर्तित होता है (ध्यान रहे कि बुधवार के दिन अभिजीत मुहूर्त नहीं होता है)। यह कुतुप और रोहिणी काल के आसपास का ही समय होता है। यदि किसी कारण कुतुप काल न मिल पा रहा हो, तो अभिजीत मुहूर्त में भी पितृ कर्म किया जा सकता है।
अपराह्न काल (दिन का 4था भाग)
वैदिक काल-गणना के अनुसार सूर्योदय से सूर्यास्त तक के पूरे दिनमान को 5 बराबर भागों में विभाजित किया जाता है -
प्रातःकाल, संगव काल, मध्याह्न काल, अपराह्न काल, सायाह्न काल
समय का गणित - यदि दिन 12 घंटे का माना जाए (सुबह 6:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक), तो अपराह्न काल दोपहर 01:12 बजे से अपराह्न 03:36 बजे तक रहता है।
ज्योतिषाचार्य पं. प्रवेश रंजन शर्मा जी
(जन्म कुंडली, अंक ज्योतिष एवं वास्तु विशेषज्ञ)
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